अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) के अज़ाब (दंड) दो हैं: अकबर (बड़ा)...
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By Mohd
6 November, 2020

अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) के अज़ाब (दंड) दो हैं: अकबर (बड़ा) और अदना (छोटा)। अज़ाब-ए-अकबर आख़िरत (परलोक) का अज़ाब है जो कुफ़्र और फ़िस्क़ (अवज्ञा) के बदले में दिया जाएगा। इसके मुक़ाबले में अज़ाब-ए-अदना है जिससे मुराद वे तकलीफ़ें हैं जो इसी दुनिया में इंसान को पहुँचती हैं। मिसाल के तौर पर व्यक्तियों के जीवन में: सख्त बीमारियाँ, अपने सबसे अज़ीज़ लोगों की मौत, दर्दनाक हादसे, नुक़सानात, नाकामियाँ वग़ैरह। और सामूहिक जीवन में: तूफ़ान, ज़लज़ले (भूकंप), सैलाब (बाढ़), वबाएँ (महामारियाँ), क़हत (सूखा/अकाल), फ़सादात (दंगे), लड़ाइयाँ और दूसरी बहुत सी बलाएँ जो हज़ारों, लाखों, करोड़ों इंसानों को अपनी चपेट में ले लेती हैं। इन आफ़तों (विपदाओं) के नाज़िल करने की हिकमत (मसलहत) यह है कि अज़ाब-ए-अकबर में मुब्तिला होने से पहले ही लोग होश में आ जाएँ और उस सोच व अमल के तौर-तरीक़े को छोड़ दें जिसके बदले में आख़िरकार उन्हें वह बड़ा अज़ाब भुगतना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, दुनिया में अल्लाह तआला ने इंसान को बिल्कुल ब-ख़ैरियत ही नहीं रखा है कि पूरे आराम व सुकून से ज़िंदगी की गाड़ी चलती रहे और आदमी इस ग़लतफ़हमी में मुब्तिला हो जाए कि उससे ऊपर कोई ताक़त नहीं है जो उसका कुछ बिगाड़ सकती हो। बल्कि अल्लाह तआला ने ऐसा इंतेज़ाम कर रखा है कि समय-समय पर व्यक्तियों पर भी और क़ौमों और मुल्कों पर भी ऐसी आफ़तें भेजता रहता है जो उसे अपनी बेबसी का और अपने से ऊंचे एक हाकिम व सुल्तान की हुक़ूमत का एहसास दिलाती हैं। ये आफ़तें एक-एक शख़्स को, एक-एक गिरोह को और एक-एक क़ौम को यह याद दिलाती हैं कि ऊपर तुम्हारी क़िस्मतों को कोई और कंट्रोल कर रहा है। सब कुछ तुम्हारे हाथ में नहीं दे दिया गया है। असल ताक़त उसी कारफ़रमा (सर्वोच्च) इक़्तेदार (सत्ता) के हाथ में है। उसकी तरफ़ से जब कोई आफ़त तुम्हारे ऊपर आए तो न तुम्हारी कोई तदबीर (योजना) उसे टाल सकती है, और न ही कोई जिन्न, या रूह, या देवी और देवता।

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'रहमान' और 'रहीम' नाम के उपयोग के शरई अहकाम
लेख

'रहमान' और 'रहीम' नाम के उपयोग के शरई अहकाम

"रहमान" शब्द का प्रयोग अल्लाह तआला के अलावा किसी और के लिए करना जायज़ नहीं है, बल्कि हराम है। अगर कोई व्यक्ति किसी इंसान को "रहमान" कहे तो यह शिर्क है, क्योंकि अल्लाह तबारक व तआला के अलावा कोई भी ऐसा नहीं हो सकता जिसकी रहमत (दया) इतनी विशाल हो। इसलिए किसी और को रहमान या अर-रहमान कहना जायज़ नहीं है।...