एक बार आप अपने एक अज़ीज़ (रिश्तेदार) के जनाज़े के साथ क़ब्रिस्तान तशरीफ़ ले गए। क़ब्रिस्तान पहुँचकर आप अलग-थलग एक जगह पर जाकर बैठ गए और कुछ सोचने लगे। किसी ने अर्ज़ किया: "ऐ अमीर-उल-मोमिनीन! आप तो इस जनाज़े के वली (सरपरस्त) थे और आप ही अलग बैठ गए?" फ़रमाया: "हाँ! मुझे एक क़ब्र ने आवाज़ देकर कहा: 'ऐ उमर बिन अब्दुल अज़ीज़! तू मुझसे यह क्यों नहीं पूछता कि मैं इन आने वालों के साथ क्या सुलूक (व्यवहार) करती हूँ?' मैंने कहा: 'ज़रूर बता।'"
उसने कहा: "जब ये मेरे अंदर आते हैं तो मैं इनके कफ़न फाड़ देती हूँ, मैं इनके बदन के टुकड़े-टुकड़े कर देती हूँ, सारा ख़ून चूस लेती हूँ, गोश्त खा लेती हूँ और बताऊँ कि आदमी के जोड़ों के साथ क्या करती हूँ? कंधों को बाज़ुओं से जुदा कर देती हूँ, बाज़ुओं को कलाइयों से जुदा कर देती हूँ, चूतड़ों (सुरैनों) को बदन से जुदा कर देती हूँ, और जाँघों को चूतड़ों से जुदा कर देती हूँ, और घुटनों को जाँघों से, और पिंडलियों को घुटनों से, और पैरों को पिंडलियों से जुदा कर देती हूँ।"
यह फ़रमाकर हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह अलैह रोने लगे और फ़रमाया: "दुनिया का क़याम (ठहराव) बहुत ही थोड़ा है और इसका धोखा बहुत ज़्यादा है। इसमें जो अज़ीज़ (सम्मानित) है, वह आख़िरत (परलोक) में ज़लील है; इसमें जो दौलत वाला है, वह आख़िरत में फ़क़ीर है; इसका जवान बहुत जल्द बूढ़ा हो जाएगा।" (अल-आक़िबह फ़ी ज़िक्र अल-मौत - अल-अशबिली, पृ. 191)