सल्फ़ (पूर्वजों) के यहाँ किताबी इल्म (ज्ञान) की हैसियत:
मौलाना फ़ैसल अहमद साहब नदवी भटकली लिखते हैं:
हमारे उलेमा-ए-सल्फ़ सिर्फ़ किताबी इल्म को कोई अहमियत नहीं देते थे, यानी अगर किसी के असातिज़ा (शिक्षक) और मशाईख़ (गुरु) न हों और सिर्फ़ किताबों से उसने कुछ इल्म हासिल किया हो, तो उसको कोई अहमियत नहीं दी जाती थी। कुछ लोग तारीख़-ए-इस्लाम (इस्लामी इतिहास) में ऐसे गुज़रे हैं जिनका तज़किरा किताबों में अज़मत (महिमा) के बजाय मज़म्मत (निंदा) के साथ आता है। उलेमा-ए-सल्फ़ ऐसे निरे किताबी इल्म वाले से इल्मी बहस के भी रवादार नहीं थे (यानी बहस करना पसंद नहीं करते थे)। कैसा इब्रतअंगेज़ (सबक सिखाने वाला) वाक़िया क़ाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाही अलैहि ने नक़्ल किया है कि इमाम अहमद रहमतुल्लाही अलैहि के ज़माने में इब्न अबी दाऊद नामी किताबी इल्म वाले एक साहब थे, वह इधर-उधर से इख़्तिलाफ़ी (विवादास्पद) मबाहिस (बहस) छेड़ते थे। ख़लीफ़ा-ए-वक़्त मोतसिम ने इमाम अहमद से कहा: "ज़रा इब्न अबी दाऊद से बात करके उन्हें ख़ामोश कीजिए।" इमाम अहमद ने फ़रमाया: "मैं कैसे बात करूँ ऐसे शख़्स से जिसको मैंने कभी किसी आलिम (विद्वान) के दर (चौखट) पर नहीं देखा?" ग़ौर कीजिए और इब्रत लीजिए कि ऐसे किताबी इल्म से लोग आज कैसे-कैसे फ़ित्ने (उत्पात/विवाद) बरपा कर रहे हैं।
(फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ की हक़ीक़त / सफ़हा (पृष्ठ): 19-20)