एक मौलाना अपना एक लतीफ़ा (चुटकुला/किस्सा) बयान करते हैं:
"मुत्तहिदा हिंदुस्तान (अविभाजित भारत) के ज़माने में, मैं अक्सर दिल्ली जाया करता था। एक मर्तबा मैं एक जलसे में गया तो वहाँ एक देहलवी (दिल्ली के) मौलवी साहब से मेरा तआरुफ़ (परिचय) हुआ। दिल्ली वालों ने पोस्टर में मेरे नाम के साथ 'शेर-ए-पंजाब' (पंजाब का शेर) लिखा था और उन मौलवी साहब के नाम के साथ 'फ़ख़्र-ए-देहली' (दिल्ली का गौरव/गर्व)...
एक मज्लिस (सभा) में सारे अहबाब (मित्र) बैठे थे और यह पोस्टर सामने था। देहलवी मौलवी साहब ने मज़ाक़िया अंदाज़ में फ़रमाया:
'मौलाना! अगर शेर-ए-पंजाब से "ये" (ی) उड़ जाए (हटा दी जाए), तो बाक़ी क्या रह जाएगा?'
(उनका मतलब यह था कि 'शेर' से 'ये' निकाल दी जाए तो बाक़ी 'शर' रह जाता है, जिसका अर्थ आफ़त या बुराई होता है, यानी पंजाब की बुराई)।
मैंने अर्ज़ किया:
'और मौलाना! अगर फ़ख़्र-ए-देहली के फ़ख़्र से "फ़े" (ف) उड़ जाए, तो बाक़ी क्या रह जाएगा?'
(बाक़ी 'ख़र' रह जाता है, और फ़ारसी में 'ख़र' गधे को कहते हैं)।
इस लतीफ़े से हाज़िरीन (वहाँ मौजूद लोग) बहुत महज़ूज़ हुए (आनंदित हुए)।
वहाँ मौजूद एक साहब जो शायर भी थे, और शायर भी दिल्ली के; उन्होंने बड़ी मतानत (गंभीरता) से कहा:
'क़िबला (हुज़ूर)! इन हुरूफ़ (अक्षरों) "ये" (ی) और "फ़े" (ف) को उड़ाइए मत, बल्कि इन्हें अपने इस्तेमाल में लाइए:
शेर की "ये" इन मौलाना को दे दीजिए, ताकि ये इसे "ख़र" (गधे) के बीच में लगाकर "ख़ैर" (भलाई/कल्याण) पा सकें। और फ़ख़्र की "फ़े" आप ले लीजिए ताकि इसे "शर" (बुराई) के आगे लगाकर "शरफ़" (सम्मान/महानता) हासिल कर सकें।'
शब्दों का बरमहल (सही समय और सही स्थान पर) इस्तेमाल भी एक ख़ूबसूरत हुनर (कला) है, और यह हुनर जानने वाला वाक़ई बड़ा हुनरमंद होता है।"