दीन (धर्म) से बे-आशना (अंजान) हैं कैसे उलू अल-अम्र (शासक) हैं,
शक्ल से हिजड़े नुमा हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
सूद (ब्याज) लेने को तरक़्क़ी जान कर हैं मुतमइन (संतुष्ट),
पैकर-ए-मक्र व दग़ा (छल-कपट के पुतले) हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
हाल-ए-उम्मत पर परेशाँ एक लम्हा भी नहीं,
ग़ाफ़िल-ए-बद्रुद्दुजा (अंधेरे के पूर्ण चंद्र अर्थात् नबी ﷺ से बेख़बर) हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
झूठ को सच की तरह कहना है उनका मश्ग़ला (शौक),
अपने हक़ में बद-दुआ हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
अहल-ए-बातिल (असत्य के लोगों) की ग़ुलामी में हमेशा मुस्तइद (तैयार),
अहल-ए-ईमाँ (आस्थावानों) पर ख़फ़ा हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
जिस जगह मम्नूअ (वर्जित) हो जाना अहल-ए-ईमाँ के लिए,
ये नुमायाँ (प्रसिद्ध/मौजूद) उस जगह हैं कैसे उलू अल-अम्र हैं।
- हुदहुद इलाहाबादी