अक़्ल मारी गई, दीनदारी गई,
इस मोबाइल से परहेज़गारी (पवित्रता) गई।
ख़्वाहिश-ए-नफ़्स (मन की इच्छाओं) में रात भर जाग कर,
मौत की याद की होशियारी (जागरूकता) गई।
मरने वालों पे मरने की लत में लगे (नश्वर लोगों के दीवाने बने),
ग़लबा-ए-दीन (दीन के वर्चस्व) की बेक़रारी गई।
नफ़्स की ख़्वाहिशों की ग़ुलामी मिली,
ग़ैर-महराम (पराए पुरुष/स्त्री) पे जब जान वारी गई।
दीन-बेज़ार (धर्म से विमुख) होते गए इस क़दर,
ज़िक्र व दावत, दुआ, आह व ज़ारी (रोकर गिड़गिड़ाना) गई।
हमको इदराक (समझ/ज्ञान) हुदहुद जैसा नहीं एक पल,
नेक लोगों से यारी हमारी गई।
~ हुदहुद इलाहाबादी