हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रहमतुल्लाह अलैह) अपने किसी सफ़र...
Ummah Post
13 November, 2021

हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रहमतुल्लाह अलैह) अपने किसी सफ़र पर रवाना हुए। जब गर्मी बहुत ज़्यादा महसूस हुई, तो पगड़ी मंगवाई और बाँध ली, फिर फ़ौरन ही उतार डाली। उनसे अर्ज़ किया गया: "ऐ अमीर-उल-मोमिनीन! आपने इसे क्यों उतार दिया? इसने तो आपको गर्मी से बचाना था।" फ़रमाया: "मुझे कुछ अश्आर (कविता की पंक्तियाँ) याद आ गए थे, जिन्हें पुराने ज़माने के लोगों ने कहा है। वे अश्आर ये हैं।"

अरबी अश्आर का अनुवाद:

(१) वह आदमी जिसके चेहरे को धूप लगती है या धूल पड़ती है, तो वह उसके ऐबदार (ख़राब) होने और बिखरने से डरता है,

(२) और वह साया (छाया) ढूँढ़ता है ताकि उसकी ताज़गी और रूप बना रहे—यह जल्द ही एक दिन क़ब्र में ख़ाक-आलूद (धूल-धूसरित) होगा।

(३) वह ऐसे अंधकारमय गड्ढे में धूल से भरा हुआ और घबराहट (वहशत) में होगा, और 'तह्तुस-सरा' (सातों ज़मीनों के नीचे सिज्जीन नामक स्थान पर, जहाँ काफ़िरों और दुराचारियों की रूहें डाली जाती हैं) में एक लंबा समय बिताएगा।

(फ़ायदा/नोट): उपर्युक्त अश्आर के साथ अल्लामा ज़हबी (रह.) ने यह शेर भी ज़िक्र किया है:

अनुवाद: "ऐ नफ़्स (आत्मा)! रद्दी (व्यर्थ) होने से पहले (आख़िरत की) तैयारी कर ले, जहाँ तुझे (हर हाल में) पहुँचना है; तू फ़ुज़ूल (बेकार) पैदा नहीं किया गया है।"

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