अल्लाह के मुक़ाबले में किसी को तरजीह (प्राथमिकता) मत दो:
इरशाद फ़रमाया कि: अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि "वल-लज़ीना आमनू अशद्दु हुब्बल-लिल्लाह" (और जो लोग ईमान वाले हैं, वे अल्लाह से सबसे ज़्यादा मोहब्बत करते हैं)।
जिन लोगों ने मेरी अज़मत (महानता) और बड़ाई को पहचान लिया.... वह मुझ पर मर-मिटता है.... जान देता है पर मुझे नाराज़ नहीं करता.... जो शेर को पहचान लेता है वह बन्दर और लोमड़ी को खुश नहीं करता.... वह अक्सरीयत (बहुमत) को नहीं देखता बस अल्लाह के हुक्म को देखता है....
शेर के मुक़ाबले में कोई इलेक्शन नहीं लड़ता.... एक तरफ़ शेर, दूसरी तरफ़ एक लाख बन्दर हैं... तो कोई बेवकूफ़ ही ऐसे वक़्त में अक्सरीयत (बहुमत) को देखेगा.....
इसी तरह अल्लाह के हुक्म के सामने दाढ़ी रखने में अक्सरीयत को मत देखो.... अल्लाह के हुक्म को देखो.... लिहाज़ा अल्लाह तआला की अज़मत के मुक़ाबले में बीवी को भी तरजीह मत दो.... आप बताओ सूरज के मुक़ाबले में सितारे इलेक्शन लड़ सकते हैं.... हालांकि उनकी अक्सरीयत (बहुमत) है....
जब महर (सूरज) नुमायाँ हुआ सब छुप गए तारे
वह हम को भरी बज़्म में तन्हा नज़र आए
लिहाज़ा दोस्तों! अल्लाह के सामने न मुआशरे (समाज) को देखो न नफ़्स (मन) को देखो, बस अल्लाह ही पर नज़र रखो....
ला तरजु इल्ला रब्ब्क (अपने रब के सिवा किसी से उम्मीद न रखो)