'खल्क-ए-कुरान' (कुरान के मख्लूक होने) के मसले पर इमाम अहमद ब...
Ummah Post
26 November, 2021

'खल्क-ए-कुरान' (कुरान के मख्लूक होने) के मसले पर इमाम अहमद बिन हम्बल (रहमतुल्लाह अलैह) को कोड़े मारे जाने की घटना इस्लामी इतिहास की प्रसिद्ध घटनाओं में से एक है। जब इमाम इस आज़माइश (परीक्षा) में कामयाब हुए, तो बाद में कभी-कभी फ़रमाते, "अल्लाह अबू अल-हैथम पर रहम फ़रमाए, अल्लाह उसकी मग़फ़िरत (क्षमा) फ़रमाए, अल्लाह उससे दरगुज़र (क्षमा) फ़रमाए।"

उनके बेटे ने एक दिन उनसे पूछा कि "अबू अल-हैथम कौन हैं जिनके लिए आप दुआ करते रहते हैं?" फ़रमाया, "क्या तुम उन्हें नहीं जानते?" कहा, "नहीं।" फ़रमाया, "जिस दिन मुझे कोड़े मारने के लिए निकाला गया था, तो मैंने देखा कि पीछे से एक आदमी मेरे कपड़े खींच रहा है। मैंने मुड़कर देखा तो उसने पूछा, 'क्या आप मुझे जानते हैं?' मैंने कहा, 'नहीं।' कहने लगा, 'मैं मशहूर जेबकतरा और डाकू अबू अल-हैथम हूँ। सरकारी रिकॉर्ड में यह बात सुरक्षित है कि मुझे अलग-अलग समय पर अठारह हजार कोड़े मारे गए हैं, लेकिन मैंने इस तुच्छ दुनिया की खातिर शैतान की आज्ञाकारिता पर पूरी दृढ़ता का प्रदर्शन किया। आप तो दीन (धर्म) के एक सर्वोच्च उद्देश्य के लिए कैद हुए हैं, इसलिए कोड़े खाते हुए दीन की खातिर रहमान (अल्लाह) की आज्ञाकारिता पर सब्र और इस्तिकामत (दृढ़ता) से काम लीजिएगा।'"

उसकी इस बात से इमाम अहमद बिन हम्बल का हौसला और मजबूत हुआ। मालूम नहीं अबू अल-हैथम को अपना यह जुमला (कथन) बाद में याद भी रहा या नहीं, लेकिन इमाम अहमद बिन हम्बल को उसका एक-एक शब्द याद रहा कि जीवन की एक कठिन मंजिल में किसी के जुमले से किस तरह हौसला बुलंद हुआ था। मर्द-ए-मोमिन (सच्चे आस्तिक) की शान यही होती है कि वह नेकी को भूलता नहीं है, वह एहसान और भलाई को हमेशा याद रखता है। इमाम को जीवन भर जब कभी अतीत के वे पल याद आते, तो वह दुआओं के फूल लेकर यादों के मज़ार पर न्योछावर कर देते।

शेर:

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,

जब सर्द हवा चली, मैंने तुझे याद किया।

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