अरबों में प्राचीन समय में पुरुष अपनी पत्नी के घोड़े को कभी नहीं बेचता था, बल्कि उसे ज़ब्ह (मार) देता था ताकि उस पर कोई दूसरा पुरुष न बैठे—इतनी ग़ैरत (आत्मसम्मान/अभिमान) होती थी।
जब एक महिला को दफ़नाया जाता है, तो उसके परिवार वाले कब्र के किनारे इस तरह इकट्ठा हो जाते हैं और उसे घेर लेते हैं कि किसी ग़ैर (अजनबी) को कब्र के करीब न आने दें! आवाज़ें बुलंद होती हैं कि जनाज़े को ढक दो, कब्र को ढक दो! यह सब कुछ उस पर ग़ैरत की वजह से होता है, जबकि वह कफ़न में लिपटी एक मृत महिला होती है!
क्या जीवित महिलाएँ इस ग़ैरत और सुरक्षा की अधिक हकदार नहीं हैं?
एक महिला का पहनावा उसके पिता की तरबियत (परवरिश), उसकी माँ की इस्मत (पवित्रता), उसके भाई की ग़ैरत और उसके शौहर की मर्दानगी को बयाँ करता है!
संस्कृति, आज़ादी और लोकतंत्र का मतलब यह नहीं है कि मूल्यों, हया (मर्यादा) और नैतिकता को छोड़ दिया जाए। अपनी बेटियों और महिलाओं के मामले में अल्लाह से डरें।
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