हज़रत इयाज़ बिन ग़नम (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैंने र...
Ummah Post
30 November, 2021

हज़रत इयाज़ बिन ग़नम (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (ﷺ) को यह फ़रमाते हुए सुना कि, "मेरी उम्मत के चुनिंदा, पसंदीदा और उच्च पदवी वाले (रफ़ी-उल-मर्तबत) लोग वे हैं जिनके बारे में मुझे मलय-ए-आला (निकटतम फ़रिश्तों) ने यह ख़बर दी है कि वे लोग ज़ाहिर में अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल की विशाल रहमत का ख़्याल करके मुस्कुराते (हँसते) हैं और दिल ही दिल में ख़ुदावंद ज़ुल-जलाल के अज़ाब व सज़ा की शिद्दत के ख़ौफ़ से रोते रहते हैं। सुबह व शाम ख़ुदा के पाकीज़ा और पवित्र घरों यानी मस्जिदों में ख़ुदा का ज़िक्र करते रहते हैं।

ज़ुबानों से ख़ुदा को रग़बत और हैबत (उम्मीद और ख़ौफ़) के साथ पुकारते रहते हैं और दिलों से उससे मिलने (लिका) के मुश्ताक़ (इच्छुक) हैं। लोगों पर उनका बोझ बेहद हल्का होता है और ख़ुद उनके अपने नफ़्स पर बहुत भारी और भारी-भरकम। ज़मीन पर पैदल अत्यंत धीमेपन और सुकून के साथ चलते हैं, अकड़ कर और इतराते हुए नहीं चलते, चींटी की चाल चलते हैं—यानी उनकी रफ़्तार से विनम्रता (तवाज़ो) और सादगी टपकती है।

वे क़ुरान की तिलावत करते हैं और पुराने व फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं। वे हर समय ख़ुदावंद ज़ुल-जलाल की नज़र में रहते हैं और अल्लाह की आँख हर वक़्त उनकी हिफ़ाज़त करती है। रूहें उनकी दुनिया में हैं और दिल उनके आख़िरत (परलोक) में। आख़िरत के सिवा उन्हें कहीं की फ़िक्र नहीं, वे हर समय आख़िरत और क़ब्र की तैयारी में लगे रहते हैं।"

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एक विद्वान की हृदयविदारक कहानी
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एक विद्वान की हृदयविदारक कहानी

चुनांचे मैं आपको एक अजीब और इब्रतनाक (सबक आमोज़) हिकायत (क़िस्सा) सुनाता हूँ जो मैंने मौलाना फ़तह मोहम्मद साहब रहमतुल्लाह अलैह से सुनी थी। मौलाना फ़रमाते हैं कि शेख़ दहान (तेल के व्यापारी) जो मक्का मुकर्रमा के एक बड़े आलिम थे, उन्होंने फ़रमाया कि मक्का मुकर्रमा में एक आलिम का इंतक़ाल हुआ और उनको दफ़...