सय्यिदुना दाऊद (अलैहिस्सलाम) फ़रमाते थे: "अगर बोलना चाँदी है तो चुप रहना सोना है।"
— (इह्या उलूम-इद्दीन: ३/१७८)
हज़रत हकीम लुक़्मान से किसी ने पूछा कि, "आप इतने बड़े मर्तबे (पद) तक कैसे पहुँचे?" फ़रमाया: "सच बोलने और फ़िज़ूल (व्यर्थ) बातों से बचने की बरकत से पहुँचा हूँ।"
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ला-यानी (बेकार की बातों) से बचने के लिए अपने मुँह में कंकड़ियाँ रख लेते थे।
— (इह्या उलूम-इद्दीन: ३/१७९)
हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं कि, "जो बहुत ज़्यादा बोलता है वह बहुत ग़लतियाँ करता है, जो बहुत ग़लतियाँ करता है उससे कसरत (अधिकता) से गुनाह सरज़द होते हैं, और जो ब-कसरत गुनाह करता है उसके लिए जहन्नम (नरक) ही ज़्यादा मुनासिब है।"
— (फ़ैज़ अल-क़दीर: ६/२८३)
हज़रत हसन बसरी (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते थे: "जो शख़्स अपनी ज़ुबान की हिफ़ाज़त (रक्षा) नहीं कर सकता, वह अपने दीन (धर्म) की हिफ़ाज़त नहीं कर सकता।"
— (इह्या उलूम-इद्दीन: ३/१७९)