*मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि वह क्या चीज़ है जो जानदार (जीव...
Ummah Post
15 November, 2024

*मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि वह क्या चीज़ है जो जानदार (जीवित) नहीं है लेकिन सांस लेती है?*

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मैं अजीब हैरत में पड़ गया कि भला वह क्या चीज़ हो सकती है जो जानदार न हो लेकिन सांस लेती हो?

काफ़ी देर के बाद अचानक क़ुरआन की यह आयत ज़ेहन (दिमाग) में कौंधी:

*"والصبح اذا تنفس"*

(सूरह अत्तकवीर, आयत 18)

"कसम है सुबह की जब वह गहरी सांस ले।"

मैंने जवाब दिया कि वह सुबह है जो जानदार तो नहीं लेकिन सांस लेती है।

पूछने वाले ने तारीफ़ की लेकिन मैं उलझ गया कि सुबह भला कैसे सांस ले सकती है?

तफ़्सीर (व्याख्या) वगैरह खोलकर देखी तो मुफ़स्सिरीन (टीकाकारों) ने 'तनफ़्फ़ुस' का अनुवाद जीवित हो जाने से किया था कि जैसे सांस लेकर इंसान जीवित होता है, उसी तरह सुबह भी हर दिन जीवित होती है। कुछ ने सुबह को सांस लेना और रात को सांस छोड़ना व्यक्त किया। कुछ ने कहा कि 'लैल' (रात) से मुराद इस्लाम से पहले का अंधेरा था और यहाँ सुबह से मुराद हुज़ूर (ﷺ) के आगमन का उजाला है।

कल एक तफ़्सीर पढ़ी तो हैरान रह गया:

आपको मालूम है कि जब हम सांस लेते हैं तो अपने अंदर ऑक्सीजन समेट लेते हैं और जब छोड़ते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड निकालते हैं।

अल्लाह तआला ने क़ुरआन में सुबह की कसम खाई और फ़रमाया कि जब वह "गहरी" सांस ले।

अजीब मामला है कि कुछ समय पहले ही विज्ञान ने "फ़ोटोसिंथेसिस" (प्रकाश संश्लेषण) की प्रक्रिया खोजी है जिसमें पेड़ एक अदृश्य तरीके से हवा में से कार्बन डाइऑक्साइड को अपने अंदर समोकर ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं। और यह प्रक्रिया सुबह के समय सबसे ज़्यादा चरम पर होती है यानी दुनिया में सबसे ज़्यादा ऑक्सीजन की मात्रा सुबह के समय पाई जाती है और यही दुनिया की गहरी सांस होती है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे कम होती जाती है, दोपहर में हल्की होती है, शाम को ख़त्म होती है और रात में उलटी हो जाती है कि पेड़ ऑक्सीजन के बजाय कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करने लगते हैं, लेकिन फिर अगली सुबह वही प्रक्रिया दोबारा शुरू हो जाती है।

मैं बेहद हैरान हुआ कि क़ुरआन की एक छोटी सी आयत ने विज्ञान की इतनी बड़ी पहेली को सैंकड़ों साल पहले बता दिया था!

सुब्हान अल्लाह (अल्लाह की जय हो)

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