*मैं नहीं जानता कि यह किस लेखक का कारनामा है। लेकिन बेहतरीन...
Ummah Post
16 November, 2024

*मैं नहीं जानता कि यह किस लेखक का कारनामा है। लेकिन बेहतरीन है।*

अल्फ़ाज़ *लिखे* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *पढ़े* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *बोले* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *गढ़े* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *तोले* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *टटोले* जाते हैं,

अल्फ़ाज़ *खंगाले* जाते हैं,

... इस तरह

अल्फ़ाज़ *बनते* हैं,

अल्फ़ाज़ *सँवरते* हैं,

अल्फ़ाज़ *बेहतर* होते हैं,

अल्फ़ाज़ *निखरते* हैं,

अल्फ़ाज़ *हँसाते* हैं,

अल्फ़ाज़ *मनाते* हैं,

अल्फ़ाज़ *रुलाते* हैं,

अल्फ़ाज़ *मुस्कुराते* हैं,

अल्फ़ाज़ *गुदगुदाते* हैं,

अल्फ़ाज़ *मीठे* होते हैं

... इतना होने के बाद भी

अल्फ़ाज़ *चुभते* हैं,

अल्फ़ाज़ *बिकते* हैं,

अल्फ़ाज़ *रूठते* हैं,

अल्फ़ाज़ *चोट* देते हैं,

अल्फ़ाज़ *ताओ* देते हैं,

अल्फ़ाज़ *लड़ते* हैं,

अल्फ़ाज़ *बिखरते* हैं,

अल्फ़ाज़ *झगड़ते* हैं,

अल्फ़ाज़ *बिगड़ते* हैं

अल्फ़ाज़ *लरजते* हैं

... लेकिन

अल्फ़ाज़ कभी *मरते* नहीं

अल्फ़ाज़ कभी *थकते* नहीं

अल्फ़ाज़ कभी *रुकते* नहीं

... इसलिए

अल्फ़ाज़ से *खेलें* नहीं

बिना सोचे समझे *बोलें* नहीं

अल्फ़ाज़ का *एहतराम* करें

अल्फ़ाज़ पर *गौर* करें

अल्फ़ाज़ को *पहचान* दें

अल्फ़ाज़ को ऊँची *उड़ान* दें

अल्फ़ाज़ को *जज़्बात* दें

उनसे उनकी *बात* करें,

अल्फ़ाज़ *ईजाद* करें

... क्योंकि

अल्फ़ाज़ *क़ीमती* हैं

ज़बान से अल्फ़ाज़ *तोल* के बोलें

अल्फ़ाज़ में *धार* होती है

अल्फ़ाज़ बहुत *अच्छे* होते हैं

और

... हक़ीक़त यह है कि

अल्फ़ाज़

की

भी

अपनी

एक दुनिया🌎 है।

*अल्फ़ाज़ को*

*इज़्ज़त दें*

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पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)
लेख

पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)

शेख़-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब (दामत बरकातुहुम) अपनी मशहूर तस्नीफ़ "उलूम-उल-क़ुरआन" में लिखते हैं: "यह पांच तफ़सीरें (यानी तफ़सीर-ए-कबीर, तफ़सीर इब्न कसीर, तफ़सीर-ए-क़ुर्तुबी, तफ़सीर रूह-उल-मआनी और तफ़सीर-ए-कश्शाफ़) अहक़र (इस नाचीज़) के मामूली ज़ौक़ के मुताबिक ऐसी हैं कि अगर...