एहतसाब (आत्म-मूल्यांकन/जवाबदेही) में इतनी गहराई भी न हो कि अपनी शिकस्तों (हार) के सिवा कुछ नज़र ही न आए। इंसान को कम से कम अपने साथ मुश्फ़िक़ (दयालु/मेहरबान) होना चाहिए। चाहे क़दम लड़खड़ाए हों, मेहनत और लगन में कमी रही हो, तब भी कभी ख़ुद को ज़्यादा दोष देने की ज़रूरत नहीं। और न ही कभी ख़ुद से मायूस होना चाहिए।
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एक वक़्त होता है जब इंसान ज़िंदगी के लिए बहुत से ख़्वाब देखता है, आरज़ूएं पालता है, ख़्वाहिशें रखता है। फिर वक़्त गुज़रता है, बहुत सी नाकामियों का सामना होता है, महरूमियों (वंचितताओं) का मुंह देखता है और अख़ीर (अंत) में सिर्फ़ एक ख़्वाब बचता है कि चैन ज़िंदगी में आ जाए और बस!!
—माइक