मौलाना अशरफ अली थानवी (रहमतुल्लाह अलैह) तो यहां तक फरमाते हैं कि गीबत (पीठ पीछे बुराई करने) से बचने का आसान रास्ता यह है कि दूसरे का ज़िक्र करो ही नहीं, न अच्छाई से ज़िक्र करो और न बुराई से ज़िक्र करो क्योंकि यह शैतान बड़ा खबीस (दुष्ट) है। इसलिए कि जब तुम किसी का ज़िक्र अच्छाई से करोगे कि फलां शख्स बड़ा अच्छा आदमी है, उसके अंदर यह अच्छाई है, तो दिमाग में यह बात रहेगी कि मैं उसकी गीबत तो नहीं कर रहा बल्कि अच्छाई से उसका ज़िक्र कर रहा हूँ, लेकिन फिर यह होगा कि उसकी अच्छाइयां बयान करते-करते शैतान कोई जुमला (वाक्य) दरमियान (बीच) में ऐसा डाल देगा जिससे वह अच्छाई बुराई में तब्दील हो जाएगी। मसलन (उदाहरण के लिए) वह कहेगा कि फलां शख्स है तो बड़ा अच्छा आदमी .. "मगर" उसके अंदर फलां खराबी है। यह लफ्ज़ ”मगर“ आकर सारा काम खराब कर देगा। इसका नतीजा यह होगा कि गुफ़्तगू (बातचीत) का रुख गीबत की तरफ मुंतकिल (स्थानांतरित) हो जाएगा। इसलिए हज़रत थानवी फरमाते हैं कि दूसरों का ज़िक्र करो ही नहीं, न अच्छाई से न बुराई से। और अगर किसी का ज़िक्र अच्छाई से कर रहे हो तो ज़रा कमर कस के बैठो ताकि शैतान गलत रास्ते पर न डाल दे।
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