♦️♦️ *उस्ताद की बे-अदबी (अनादर) का अंजाम* ♦️♦️

मुफ़क्किर-...
Ummah Post
17 November, 2024

♦️♦️ *उस्ताद की बे-अदबी (अनादर) का अंजाम* ♦️♦️

मुफ़क्किर-ए-इस्लाम हज़रत मौलाना अली मियां साहब नदवी रहि० ने एक वाक़िया नक़्ल किया है, फ़रमाते हैं कि हमारे साथ एक छात्र पढ़ता था, अहमद अली निगरामी नाम था उसका, उसका नाम भी हज़रत ने अपनी किताब में नक़्ल किया है, कहा कि वह अत्यधिक बुद्धिमान था। अरबी द्वितीय (Arabii Dom) में जब वह पहुंचा तो वह अरबी सीखने लगा और जब वह अरबी तृतीय (Arabii Som) में पहुंचा तो बेझिझक अरबी बोलता था, सभी उस्तादों को उस पर नाज़ (गर्व) था। लेकिन हज़रत मौलाना सैयद सुलेमान नदवी रहि० ने जब अपना ताल्लुक हज़रत थानवी रहि० से क़ायम किया, तो नदवा के कुछ छात्रों ने उनकी मुख़ालफ़त (विरोध) की और स्ट्राइक (हड़ताल) की, तो यह छात्र सबसे आगे-आगे था। वह छात्र अभी छात्र जीवन से फ़ारिग़ (मुक्त) नहीं हुआ था कि उसे बीमारी लग गई, इतनी ख़तरनाक बीमारी लगी कि उसके घरवालों ने उसे हाथ-पांव बांधकर घर पर रख दिया। वह फ़रमाते हैं कि मेरे भाई अब्दुल अली साहब रहि० चूंकि डॉक्टर थे, उन्हें बुलाया गया कि यह कौन सी बीमारी में मुब्तला (ग्रसित) हो गया है? इसके बाद उन्होंने बहुत इलाज किया, लेकिन वह ठीक हुआ नहीं। मैं अपने उस्ताद की ख़िदमत में गया और कहा, 'हज़रत! इस छात्र ने आपको बहुत सताया है, आपने इसे कोई बददुआ तो नहीं दी?' वह फ़रमाते हैं कि हज़रत ने कुछ जवाब नहीं दिया। फिर मैंने कहा, 'हज़रत! बददुआ दी हो तो माफ़ कर दें, इसकी तरफ़ से मैं माफ़ी मांगता हूँ, क्योंकि वह अत्यधिक बुद्धिमान छात्र था।' हज़रत ने मुझसे कुछ कहा नहीं तो मैं आ गया।

दूसरे दिन जब मैं गया तो हज़रत ने कहा कि ठीक है, मैंने उसे माफ़ कर दिया, मैंने उसके लिए दुआ की। वह फ़रमाते हैं कि तीसरे ही दिन मैंने उसे बाज़ार में देखा कि वह बाज़ार में सही-सलामत जा रहा था। मुझे बहुत उम्मीद थी कि वह बहुत काम करेगा, मुझसे भी अच्छा लिखने वाला था, लेकिन हफ़्ते के बाद पता चला कि वह किसी हादसे (दुर्घटना) में इंतक़ाल कर गया (मृत्यु हो गई)।

📚 माहनामा अल-फ़ारूक़, ज़ुल-क़ादा 1431 हि० पृ: 12

मन्क़ूल (उद्धृत)।

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फ़ज़ल बिन रबी' की दरियादिली
लेख

फ़ज़ल बिन रबी' की दरियादिली

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