*✍🏻 ज़िंदगी के हर गुज़रते दिन में अगर आपको एक लम्हा भी ख़ुशी का मयस्सर (प्राप्त) हो, तो उसी लम्हे का शुक्रिया अदा किया करें; अपनी ज़ुबान और दिल को अल्लाह की नाशुक्रगुज़ारी से बचाएं।"*
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाया करते थे:
"मेरा दुनिया से क्या तअल्लुक़ (संबंध)? मेरी दुनिया की मिसाल तो ऐसी ही है कि जैसे कोई सवार किसी दरख़्त (पेड़) के साए में (दम लेने के लिए) ठहर जाए, फिर उसे छोड़ कर चला जाए।" हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों को वसीयत फ़रमाई: "(दुनिया से) गुज़र जाओ, इसे आबाद करने में न लग...