नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का वजूद उन तमाम खूबियों और कम...
Ummah Post
28 January, 2024

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का वजूद उन तमाम खूबियों और कमालात (पूर्णताओं) का जामे (संग्रह) था जो मुतफ़र्रिक़ (अलग-अलग) तौर पर लोगों के विभिन्न तबकों में पाए जाते हैं। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) असाबत-ए-फ़िक्र (विचार की शुद्धता), दूरबीनी (दूरदर्शिता) और हक़-पसंदी का बुलंद मीनार थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को हुस्न-ए-फ़रासत (उत्कृष्ट समझ), पुख़्तगी-ए-फ़िक्र और वसीला व मक़सद की दुरुस्ती से हज़-ए-वाफ़िर (बड़ा हिस्सा) अता हुआ था। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी तवील (लंबी) ख़ामोशी से मुसलसल ग़ौर-ओ-ख़ौज़ (निरंतर चिंतन), दायमी तफ़्कीर (शाश्वत सोच) और हक़ की कूरिद (खोज) में मदद लेते थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी शादाब अक़्ल और रोशन फ़ितरत (स्वभाव) से ज़िंदगी के सहीफ़े, लोगों के मामलात और जमातों के अहवाल (स्थितियों) का मुताला किया। और जिन ख़ुराफ़ात (कुप्रथाओं) में यह सब लतपत थीं, उनसे सख़्त बेज़ारी महसूस की। चुनाँचे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इन सब से दामन-कश (अलग) रहते हुए पूरी बसीरत (अंतर्दृष्टि) के साथ लोगों के दरमियान ज़िंदगी का सफ़र तय किया। यानी लोगों का जो काम अच्छा होता उसमें शर्कत फ़रमाते, वरना अपनी मुक़र्ररा तन्हाई की तरफ़ पलट जाते। चुनाँचे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने शराब को कभी मुंह न लगाया, आस्तानों का ज़बीहा (मूर्तियों के नाम पर चढ़ाया मांस) नहीं खाया, और बुतों (मूर्तियों) के लिए मनाए जाने वाले त्योहारों और मेलों-ठेलों में कभी शर्कत न की। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को शुरू ही से इन बातिल माबूदों (झूठे देवताओं) से इतनी नफ़रत थी कि इनसे बढ़कर आपकी नज़र में कोई चीज़ मबग़ूज़ (अप्रिय) न थी, यहाँ तक कि लात व उज़्ज़ा की क़सम सुनना भी आपको गवारा न था।

इसमें शुब्हा (संदेह) नहीं कि तक़दीर ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर हिफ़ाज़त का साया डाल रखा था। चुनाँचे जब बअज़ (कुछ) दुनियावी तमतुआत (भोग-विलास) के हुसूल के लिए नफ़्स के जज़्बात मुतहर्रिक (सक्रिय) हुए या बअज़ नापसंदीदा रस्म-ओ-रिवाज की पैरवी पर तबीअत आमादा हुई, तो इनायत-ए-रब्बानी (दैवीय कृपा) दख़ील (बाधक) होकर रुकावट बन गई। इब्न-ए-असीर की एक रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: "अहल-ए-जाहिलियत जो काम करते थे, मुझे दो दफ़ा के अलावा कभी उनका ख़्याल नहीं गुज़रा। लेकिन उन दोनों में से भी हर दफ़ा अल्लाह तआला ने मेरे और उस काम के दरमियान रुकावट डाल दी। इसके बाद फिर कभी मुझे उसका ख़्याल नहीं गुज़रा यहाँ तक कि अल्लाह ने मुझे अपनी पैग़म्बरी से मुशर्रफ़ (सम्मानित) फ़रमा दिया। हुआ यह कि जो लड़का बलाई मक्का (ऊपरी मक्का) में मेरे साथ बकरियां चराया करता था, उससे एक रात मैंने कहा कि क्यों न तुम मेरी बकरियां देखो और मैं मक्का जाकर दूसरे जवानों की तरह वहाँ की शबाना क़िस्सा-गोई (रात की कहानियों) की महफ़िल में शर्कत कर लूँ। उसने कहा ठीक है। इसके बाद मैं निकला और अभी मक्का के पहले ही घर के पास पहुँचा था कि बाजे की आवाज़ सुनाई पड़ी। मैंने दरियाफ़्त (पूछा) किया कि क्या है? लोगों ने बतलाया कि फ़लां की फ़लां से शादी है। मैं सुनने बैठ गया और अल्लाह ने मेरा कान बंद कर दिया और मैं सो गया। फिर सूरज की तमाज़त (धूप की गर्मी) ही से मेरी आँख खुली और मैं अपने साथी के पास वापस चला गया। उसके पूछने पर मैंने तफ़्सीलात बताईं। इसके बाद एक रात फिर मैंने यही बात कही और मक्का पहुँचा तो फिर उसी रात की तरह का वाक़िया पेश आया, और इसके बाद फिर कभी ग़लत इरादा न हुआ।"

सहीह बुख़ारी में हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह से मरवी (वर्णित) है कि जब काबा तामीर (पुनर्निर्माण) किया गया, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और हज़रत अब्बास पत्थर ढो रहे थे। हज़रत अब्बास ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कहा: "अपना तहबंद अपने कंधे पर रख लो, पत्थर से हिफ़ाज़त रहेगी।" लेकिन आप ज़मीन पर जा गिरे, निगाहें आसमान की तरफ़ उठ गईं। अफ़ाक़ा (होश) होते ही आवाज़ लगाई: "मेरा तहबंद! मेरा तहबंद!" और आपका तहबंद आपको बांध दिया गया। एक रिवायत के अल्फ़ाज़ यह हैं कि इसके बाद आपकी शर्मगाह कभी नहीं देखी गई।

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी क़ौम में शीरीं (मधुर) किरदार, फ़ाज़िलाना अख़लाक़ और करीमाना आदतों के लिहाज़ से मुम्ताज़ (सर्वश्रेष्ठ) थे। चुनाँचे आप सबसे ज़्यादा बा-मुरव्वत, सबसे ख़ुश-अख़लाक़, सबसे मुअज्ज़ज़ (प्रतिष्ठित) हमसाये (पड़ोसी), सबसे बढ़कर दूरंदेश, सबसे ज़्यादा रास्त-गो (सत्यवादी), सबसे नर्म-पहलु, सबसे ज़्यादा पाक-नफ़्स, ख़ैर (भलाई) में सबसे ज़्यादा करीम, सबसे नेक-अमल, सबसे बढ़कर पाबंद-ए-अहद (वादे के पक्के) और सबसे बड़े अमानतदार थे। यहाँ तक कि आपकी क़ौम ने आपका नाम ही 'अमीन' (विश्वासपात्र) रख दिया था; क्योंकि आप अहवाल-ए-सालिहा (नेक स्थितियों) और ख़िसाल-ए-हमीदा (प्रशंसनीय गुणों) के पैकर (प्रतीक) थे। और जैसा कि हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की शहादत (गवाही) है, आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) दरमांदों (बेसहारा लोगों) का बोझ उठाते थे, तही-दस्तों (गरीबों) का बंदोबस्त फ़रमाते थे, मेहमान की मेज़बानी करते थे, और मसायब-ए-हक़ (सत्य की राह में आने वाली मुसीबतों) में इआनत (सहायता) फ़रमाते थे।

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लेख

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