✍ अहल-ए-दिल (धर्मपरायण लोगों) को तड़पा देने वाले अश्आर (शेर)!
रह के दुनिया में बशर (मनुष्य) को नहीं ज़ेबा (उचित) ग़फ़लत,
मौत का ध्यान भी लाज़िम (अनिवार्य) है कि हर आन (पल) रहे।
जो बशर आता है दुनिया में ये कहती है क़ज़ा (मौत/भाग्य),
मैं भी पीछे चली आती हूँ ज़रा ध्यान रहे।
(यह अश्आर हज़रत हकीमुल उम्मत हज़रत थानवी ؒ की ख़ानक़ाह में लिखे हुए थे)
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