"अल्लाहुम्मा अहियनी मिस्कीनों व अमितनी मिस्कीनों वहशुरनी फ़ी ज़ुमरतिल-मसाकीनी यौमल-क़ियामाह।"
तरजुमा (अनुवाद): ऐ अल्लाह! मुझे मिस्कीन (विनीत/ग़रीब) ज़िंदा रखिए और मिस्कनत ही में मौत दीजिए और आख़िरत (क़यामत के दिन) में भी मिस्कीनों (मसाकीन) की जमात के साथ मेरा हश्र (पुनरुत्थान) हो।