"इन्नमा अशकू बथ्थी व हुज़नी इलल्लाह" (मैं अपनी परेशानी और अपने ग़म की फ़रियाद सिर्फ़ अल्लाह ही से करता हूँ)।
ज़िंदगियों की आज़माइशों (इम्तिहानों) पर इंसान का ग़मगीन होना फ़ितरी (स्वाभाविक) है।
मुहासिबा (जवाबदेही) इस बात पर है कि इस जज़्बे पर आपका रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) क्या था।
क्या आप अल्लाह से नाउम्मीद हो गए?
या किसी की दी गई तकलीफ़ पर आप इतने कड़वे हो गए कि आप मज़ीद (और) लोगों के साथ तल्ख़ (कठोर) होने लगे और उनके साथ ज़्यादती करने लगे।
यह गुनाह की बात है।
अपने ट्रामाज़ (सदमे/मानसिक तनाव) से निकलने की कोशिश करनी चाहिए।
अल्लाह से दुआ करनी चाहिए और लोगों पर उसका ग़ुस्सा नहीं निकालना चाहिए।
अल्लाह से तौबा कीजिए ♥️💯