कुछ दुआएं लफ़्ज़ों के लिबादे (पोशाक) में नहीं आतीं
और न ही अल्फ़ाज़ के पहनावे में...
बस रब के रू-ब-रू (सामने)....
सज्दों में ससकियों की नज़र की जाती हैं...!!
और फिर ...
इत्मीनान-ए-क़ल्ब (दिल का सुकून) मिल जाता है। ❣️
क्योंकि बात कातिब-ए-तक़्दीर (तक़्दीर लिखने वाले) को सुना दी गई होती है,
और वो बेहतरीन फ़ैसला साज़ (फ़ैसला करने वाला) है...!! 🤍
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