*बुज़ुर्गों की ख़िदमत में इसलाह-ए-इल्म (ज्ञान के सुधार) के ल...
Ummah Post
22 March, 2025

*बुज़ुर्गों की ख़िदमत में इसलाह-ए-इल्म (ज्ञान के सुधार) के लिए भी जाना चाहिए*

"मशाइख़ (बुज़ुर्गों/गुरुओं) के यहाँ जाने की ज़रूरत उमूमन यह समझी जाती है कि अमल (कर्म) की इसलाह हो, मगर मैं कहता हूँ कि इल्म (ज्ञान) की इसलाह के लिए भी जाना चाहिए, इसलिए कि सही इल्म अल्लाह वालों ही के पास होता है। इल्म क़ील-ओ-क़ाल (बहस और बातों) का नाम नहीं है, बल्कि एक नूर (प्रकाश) है जो अल्लाह की तरफ़ से मोमिन के क़ल्ब (हृदय) में डाला जाता है। और मैं समझता हूँ कि अमली गुमराही, इल्मी गुमराही का नतीजा है और यह इस ज़माने में आम है। अक़ाइद (मान्यताओं/अक़ीदे) का तअल्लुक़ इल्म ही से है; इल्म सही न होगा तो अक़ीदा भी सही नहीं रह सकता।"

मुस्लिह-उल-उम्मत हज़रत *मौलाना शाह वसीउल्लाह* फ़तेहपुरी रहमतुल्लाह अलैह

(तज़किरा मुस्लिह-उल-उम्मत, सफ़ा 169)

Share this article
पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:
लेख

पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:

हज़रत मौलाना सैयद असग़र हुसैन रहिमतुल्लाह अलैह (जो अपने मिलने वालों में हज़रत मियां साहब के नाम से मशहूर थे) दारुल उलूम देवबंद के उन उस्तादों में से थे जो शोहरत और नाम-ओ-नमूद (دکھاوے) से हमेशा कोसों दूर रहे। उन्होंने जीवन भर इस्लामी उलूम (ज्ञान) की तदरीस (शिक्षण) की सेवा की और हज़ारों छात्रों को अपन...