सुकरात ने एक बार कहा था:
"अगर कोई गधा मुझे लात मारता है तो क्या मैं उस पर मुक़दमा करूँगा, शिकायत करूँगा या उसे वापस लात मारूँगा?"
बात यह नहीं कि हर मुबाहिसा (बहस) जीता जाए या हर दलील में कामयाबी हासिल की जाए, बल्कि यह है कि अपनी तवानाई (ऊर्जा) उन लोगों पर सर्फ़ (खर्च) की जाए जो इसके मुस्तहिक़ (हक़दार) हों।
जहालत (अज्ञानता) चीख़ती है, जबकि अक़्ल ख़ामोश रहती है। जब किसी के पास देने के लिए तोहीन (अपमान) और शोर-शराबे के सिवा कुछ न हो, तो सबसे ताक़तवर जवाब ख़ामोशी है।
किसी ऐसे शख़्स की सतह (स्तर) पर मत गिरें जो महज़ तनाज़ात (विवादों) के लिए कोशां (प्रयासरत) हो।
सच्ची ज़हानत (बुद्धिमत्ता) को ख़ुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं होती, यह अपनी रोशनी से ख़ुद-ब-ख़ुद नुमायाँ (प्रकट) हो जाती है।