ग़ज़ल अज़ मुफ़्ती मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब:
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वो मौत क्या, जो न दे तेरी दीद का तोहफ़ा
जो तेरी धुुन में न गुज़रे वो ज़िंदगी क्या है?
न तेरा ज़िक्र हो जिन में वो मजलिसें बर्बाद
हो तेरी याद से ख़ाली तो ख़ामोशी क्या है?
जो इल्म मुझ को न पहुंचाए तेरी चौखट तक
न मुझ को तेरा पता दे जो आगाही क्या है
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किताब: गोशा-ए-तन्हाई (शेरी मजमुआ)
(सफ़ा नंबर 115)
तालीफ़: हज़रत मुफ़्ती मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब