*सोशल मीडिया: एक खामोश दुश्मन*

मजबूत दरवाजे, खिड़कियों पर...
Ummah Post
9 April, 2025

*सोशल मीडिया: एक खामोश दुश्मन*

मजबूत दरवाजे, खिड़कियों पर जालियां और बाहरी दुनिया से हर मुमकिन बचाव। एक पिता ने अपनी बेटियों और पत्नी को हर आफत से बचाने के लिए ऊंची दीवारें खड़ी कर दीं, लेकिन वह यह भूल गया कि फितने (बुराइयां) अब दरवाजे से नहीं आते, बल्कि हाथों में पकड़ी छोटी सी स्क्रीन के जरिए दाखिल होते हैं।

आज सोशल मीडिया का जाल हर घर में फैल चुका है। माता-पिता समझते हैं कि उनके बच्चे सुरक्षित हैं क्योंकि वे घर से बाहर नहीं निकलते, मगर वे नहीं जानते कि अजनबी और गैर-महश्रम खुद उनके घरों में बैठे हैं। हर पल एक नई दोस्ती, एक नया रिश्ता और एक नया धोखा।

यही वह रास्ता है जिसने न जाने कितने घरों को उजाड़ दिया। मोहब्बत के नाम पर नाजायज ताल्लुकात, झूठे वादे, इज्ज़तों की नीलामी, ब्लैकमेलिंग और आखिरकार परिवारों की बर्बादी। वह बेटियां जो कभी घर की चारदीवारी में सबसे ज्यादा सुरक्षित समझी जाती थीं, आज सोशल मीडिया के जरिए शिकार हो रही हैं।

ज़िम्मेदारी किसकी है?

अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:

"तुम में से हर शख्स निगेहबान (रक्षक) है और उससे उसकी रियाया (जिसकी वह जिम्मेदारी संभालता है) के बारे में पूछा जाएगा।" (बुखारी व मुस्लिम)

माता-पिता की ज़िम्मेदारी सिर्फ खाने-पीने और कपड़े मुहैया कराने तक सीमित नहीं है। उन्हें अपनी औलाद की नैतिक और अख्लाकी तरबियत (परवरिश) भी करनी है। अगर माता-पिता ने यह समझ लिया कि उनकी ज़िम्मेदारी बस भौतिक जरूरतें पूरी करने तक है, तो याद रखें कि एक दिन यही औलाद उनकी आंखों के सामने बर्बाद हो सकती है।

क्या किया जाए?

बेटियों को यह समझ (शऊर) दें कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती। सोशल मीडिया पर मिलने वाले लोग अक्सर झूठे होते हैं, जो सिर्फ वक्ती (अस्थायी) अल्फाज से दिल बहलाने आते हैं और बाद में रुसवाई छोड़ जाते हैं।

माता-पिता खुद भी सावधान रहें। अगर खुद माता-पिता ही मोबाइल और सोशल मीडिया के आदी होंगे, तो औलाद इससे कैसे बच सकेगी?

धार्मिक शिक्षा और तरबियत पर ध्यान दें। कुरान और हदीस की रोशनी में बेटियों को हया (शालीनता), इज्ज़त और परदे की अहमियत समझाएं।

भरोसे का रिश्ता बनाएं। ऐसा न हो कि डर की दीवारें बेटी को माता-पिता से ही दूर कर दें। उसकी समस्याओं को सुनें और उन्हें प्यार व हिकमत (बुद्धिमत्ता) से हल करें।

सच्ची सुरक्षा

दरवाजे बंद करने से फितने नहीं रुकते, बल्कि दिलों को तक़्वा (अल्लाह के खौफ) से मजबूत करने की जरूरत है। अगर बेटी के दिल में हया और अल्लाह का डर होगा, तो सोशल मीडिया का कोई भी फितना उसे बहका नहीं सकेगा। इसलिए असल ध्यान मोबाइल छीनने के बजाय दिलों को ईमान से जोड़ने पर होना चाहिए।

ऐ माता-पिता! हिफाजत (सुरक्षा) सिर्फ दीवारों से नहीं, दिलों से भी की जाती है।

*इस लेख को सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर पुण्य) और अल्लाह की रज़ा की नीयत से अपने प्रियजनों और स्थानीय समूहों में साझा करें। हो सकता है कि आपकी थोड़ी सी मेहनत या कोशिश से अल्लाह पाक किसी की जिंदगी बदल दे।*

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