"क्या मज़लूमों (पीड़ितों) के हक़ में बोलना जुर्म है?
यह कैसा वक़्त आ गया है कि ग़ज़ा के मासूम बच्चों के लिए दो लफ़्ज़ बोलने पर हथकड़ियां पहनाई जा रही हैं? संभल, उत्तर प्रदेश में सात मुसलमानों को सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने दीवार पर एक पोस्टर चिपकाया था जिस पर लिखा था 'फ्री फिलिस्तीन, फ्री ग़ज़ा' और अपील की गई थी कि ज़ालिम रियासत (उत्पीड़क देश) के उत्पादों का बहिष्कार किया जाए।
क्या यही है हमारा इंसाफ?
क्या यही है जम्हूरियत (लोकतंत्र) का मतलब?
क्या यह जुर्म है कि कोई ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा हो?
इन नौजवानों ने किसी से नफ़रत नहीं फैलाई, किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाया, सिर्फ़ एक आवाज़ बुलंद की मज़लूमों के हक़ में, बेगुनाहों के समर्थन में, और ज़ालिमों के बहिष्कार में। लेकिन इस आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई, हथकड़ियां पहना दी गईं, और पैग़ाम दे दिया गया कि अगर तुम हक़ (सच्चाई) की बात करोगे तो तुम्हें ख़ामोश कर दिया जाएगा।
यह सिर्फ़ सात अफ़राद (लोगों) की गिरफ़्तारी नहीं, यह आज़ादी-ए-राय (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर हमला है, यह इंसानियत के ज़मीर पर ज़र्ब (चोट) है।"