'रहमान' और 'रहीम' नाम के उपयोग के शरई अहकाम
"रहमान" शब्द का प्रयोग अल्लाह तआला के अलावा किसी और के लिए करना जायज़ नहीं है, बल्कि हराम है। अगर कोई व्यक्ति किसी इंसान को "रहमान" कहे तो यह शिर्क है, क्योंकि अल्लाह तबारक व तआला के अलावा कोई भी ऐसा...
"रहमान" शब्द का प्रयोग अल्लाह तआला के अलावा किसी और के लिए करना जायज़ नहीं है, बल्कि हराम है। अगर कोई व्यक्ति किसी इंसान को "रहमान" कहे तो यह शिर्क है, क्योंकि अल्लाह तबारक व तआला के अलावा कोई भी ऐसा...
शेख़ सलमान अल-औदा अपनी किताब "ज़ंज़ाना" में लिखते हैं कि: एक मर्तबा मैंने अपने शेख़ से शिकायत की कि: मैंने एक किताब पढ़ी लेकिन मुझे उसमें से कुछ भी याद नहीं रहा, चुनाँचे उन्होंने मुझे एक खजूर दी और फ...
अल्लामा बद्रुद्दीन बिन शिबली अपनी मशहूर किताब "आकामुल मुर्जान फी अहकामिल जान" में नक़्ल करते हैं कि शैतान-ए-लईन (शापित शैतान) के इंसान को नुक़सान पहुँचाने के 6 दरजात हैं: (1) पहले मरहले (चरण) में व...
जब तक ईसाई धर्म राजनीति से तालमेल में नहीं था, तब तक दुनिया की हर कौम (राष्ट्र) का अपना एक अलग पहनावा होता था। अब भी जहाँ-जहाँ ईसाई धर्म किसी कौम की राजनीति पर असरअंदाज़ नहीं हुआ है, वहाँ अब भी उस कौम...
हज़रत हकीमुल उम्मत थानवी और हज़रत शाह वसीउल्लाह इलाहाबादी (नूरुल्लाह मरक़दहुमा) दोनों ने यह वाक़िया नक़्ल किया कि एक परहेज़गार आलिम बच्चों को पढ़ाते थे। एक दिन उनके घर में फ़क्र व फ़ाक़ा (ग़रीबी और भु...
अस्लाफ़ (पूर्वजों) के यहाँ शौक़-ए-मुताला (अध्ययन का शौक़) और समय के महत्व का यह आलम था कि पैदल चलते हुए भी किताब का मुताला जारी रहता। इब्न अल-आबनूसी कहते हैं कि अल्लामा ख़तीब बग़दादी ؒ पैदल चल रहे होत...
मुदर्रिसीन (शिक्षकों) को चाहिए कि हर तालिब-ए-इल्म (छात्र) को पूरा अरबी पढ़ाना ज़रूरी न समझें, जिसके अंदर मुनासबत (योग्यता) देखें, और फ़हम-ए-सलीम (सही समझ) पाएँ, उसको सब किताबें पढ़ा दें, और जिसको मुना...
"ख़ुदा की क़सम! अगर आप अहल-ए-ग़ज़ा (ग़ज़ा वासियों) पर ढाए जाने वाले मज़ालिम (अत्याचार) और तकलीफ़ें देखें तो आप दंग रह जाएं, ज़ेहन इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएगा कि आख़िर एक इंसान इन तमाम मज़ालिम और तकल...
मुस्निद अल-हिंद, इमाम-ए-अकबर हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी ؒ ने इर्शाद फ़रमाया है कि अक़ीदा-ए-तौहीद की तकमील (पूर्णता) के लिए चार दर्जों की तौहीद का मानना लाज़िम है, अगर किसी भी दर्जे की तौहीद मे...
रवायत है कि सात सौ बरस पहले इस्फ़हान में एक मस्जिद बन रही थी। काम तक़रीबन ख़त्म हो चुका था और कारीगर छोटे-छोटे आख़िरी काम कर रहे थे। एक बूढ़ी औरत का वहाँ से गुज़र हुआ। वह अचानक खड़ी हो गई और मस्जिद के...
❶. अज़ीम मुहद्दिस और उस्ताद-उत-तबीर इमाम मुहम्मद बिन सीरीन ؒ पर वफात के वक्त गिरिया तारी था और फरमा रहे थे कि "मुझे गुज़िश्ता ज़िंदगी की कोताहियाँ और जन्नत में जाने वाले आमाल में कमी और जहन्नुम से बचा...