हज़रत तल्हा के इस्लाम क़बूल करने का दिलचस्प वाक़िया
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हज़रत तल्हा के इस्लाम क़बूल करने का दिलचस्प वाक़िया

admin
15 Oct, 2024

हज़रत तल्हा (रज़ियल्लाहु अन्हु) अपना इस्लाम क़बूल करने का वाक़िया (घटना) बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि: एक मर्तबा मैं बुसरा (بصری) के बाज़ार और मेले में मौजूद था, वहाँ एक पादरी अपने गिरजाघर की ऊपरी मंज़िल (बालो-ख़ाने) में रहता था। उसने एक दिन मेरे सामने लोगों से कहा, "इस बाज़ार और मेले वालों से पूछो कि क्या इनमें कोई हरम (मक्का) में रहने वाला है?"

मैंने कहा, "हाँ, मैं हूँ!"

पादरी ने पूछा, "क्या अहमद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का ज़हूर (आगमन) हो गया?"

मैंने दरयाफ़्त (पूछा) किया, "अहमद कौन?"

पादरी ने कहा, "अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब के बेटे, और यह वह महीना है जिसमें उनका ज़हूर होगा और वह आख़िरी नबी हैं। हरम (मक्का) में उनका ज़हूर होगा और वह हिजरत (प्रस्थान) करके ऐसी जगह जाएँगे जहाँ खजूरों के बाग़ात होंगे, पथरीली और नमकीन (शोरीली) ज़मीन होगी। कहीं ऐसा न हो कि लोग तो उनका इत्तिबा (अनुसरण) कर लें और तुम उनसे पीछे रह जाओ।" पादरी ने मुझे तफ़्सील (विस्तार) से बताया, उसकी बात मेरे दिल को लगी और मैं वहाँ से तेज़ी से चला और मक्का पहुँच गया। वहाँ मैंने पूछा, "क्या कोई नई बात पेश आई है?" लोगों ने मुझे बताया कि, "हाँ! मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह, जो 'अमीन' के लक़ब (उपाधि) से मशहूर हैं, उन्होंने नुबुव्वत का दावा किया है और इब्न अबी क़ुहाफ़ा (हज़रत अबू बक्र) ने उनका इत्तिबा कर लिया है।" यह सुनकर मैं हज़रत अबू बक्र के पास गया और मैंने कहा, "क्या आपने इस आदमी का इत्तिबा कर लिया है?"

उन्होंने जवाब दिया, "हाँ......... तुम भी उनकी ख़िदमत में जाओ और उनका इत्तिबा कर लो, क्योंकि वह हक़ (सत्य) की दावत देते हैं।"

इसके बाद हज़रत तल्हा ने हज़रत अबू बक्र को उस पादरी की बात बताई। हज़रत अबू बक्र, हज़रत तल्हा को हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ख़िदमत में ले गए, वहाँ हज़रत तल्हा मुसलमान हो गए। फिर उन्होंने हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भी उस पादरी की बात बताई जिससे हुज़ूर को बहुत ख़ुशी हुई। जब हज़रत अबू बक्र और हज़रत तल्हा दोनों मुसलमान हो गए, तो इन दोनों हज़रात को नौफ़ल बिन ख़ुवैलद बिन अल-अदविया ने पकड़कर एक रस्सी में बाँध दिया और बनू तमीम ने इन दोनों को न बचाया। नौफ़ल बिन ख़ुवैलद को 'मुशीर-ए-क़ुरैश' (क़ुरैश का सलाहकार) कहा जाता था। एक रस्सी में बाँधे जाने की वजह से हज़रत अबू बक्र और हज़रत तल्हा को 'क़रीनेन' (दो साथी) कहा जाता है। इमाम बैहक़ी की रिवायत में यह भी है कि हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह दुआ माँगी कि: "ऐ अल्लाह! हमें इब्न अल-अदविया के शर (बुराई) से बचा।"

(अशरा मुबश्शरा के दिलचस्प वाक़ियात, पृष्ठ: 218)

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