हदीस अल-रसूल ﷺ

عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا ، قَالَتْ : قَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : إِنِّي لَأَعْلَمُ إِذَا كُنْتِ عَنِّي رَاضِيَةً وَإِذَا كُنْتِ عَلَيَّ غَضْبَى ، قَالَتْ : فَقُلْتُ : مِنْ أَيْنَ تَعْرِفُ ذَلِكَ ؟ فَقَالَ : أَمَّا إِذَا كُنْتِ عَنِّي رَاضِيَةً ، فَإِنَّكِ تَقُولِينَ : لَا وَرَبِّ مُحَمَّدٍ ، وَإِذَا كُنْتِ عَلَيَّ غَضْبَى ، قُلْتِ : لَا وَ رَبِّ إِبْرَاهِيمَ ، قَالَتْ : قُلْتُ : أَجَلْ ، وَاللَّهِ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا أَهْجُرُ إِلَّا اسْمَكَ(بُخاری شریف:۵۲۲۸)
अनुवाद
सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं: मुझसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "मैं समझ जाता हूँ जब तुम मुझसे राजी होती हो और जब नाराज़ होती हो।" सिद्दीक़ा ने पूछा: "आप यह बात किस तरह पहचानते हैं?" (क्योंकि खुशी ना-खुशी दिल की कैफ़ियात हैं, उनको पहचानने के लिए क़राइन (संकेत) चाहिए)। आपने फरमाया: "जब तुम मुझसे खुश होती हो तो कहती हो, 'नहीं, रब्बे मुहम्मद की क़सम!' और जब तुम नाराज़ होती हो तो कहती हो, 'नहीं, रब्बे इब्राहीम की क़सम!'" सिद्दीक़ा ने कहा: "क्यों नहीं यानी आपकी यह बात सही है, नहीं छोड़ती मैं मगर आपके नाम को यानी मुहब्बत उस वक़्त भी दिल में जागुज़ीं (बसी) होती है।" (तुहफ़तुल क़ारी)
पूर्ण स्वतंत्रता का भ्रम: अभिनेत्री हुमैरा असगर की दर्दनाक कहानी
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