عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : لِكُلِّ نَبِيٍّ دَعْوَةٌ مُسْتَجَابَةٌ يَدْعُو بِهَا ، وَأُرِيدُ أَنْ أَخْتَبِئَ دَعْوَتِي شَفَاعَةً لِأُمَّتِي فِي الْآخِرَةِ (بُخاری شریف: ۶۳۰۴)
अनुवाद
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "हर नबी के लिए एक (मक़बूल) दुआ है (पस हर नबी ने अपनी वह मक़बूल दुआ दुनिया में मांग ली) और मैं चाहता हूँ कि अपनी (मक़बूल) दुआ को रिज़र्व रखूँ, आख़िरत में मेरी उम्मत की शिफ़ाअत के लिए।" (तुहफ़तुल क़ारी)