حَدَّثَنَا أَنَسُ بْنُ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ ، أَنَّ رَجُلًا ، قَالَ : يَا نَبِيَّ اللَّهِ ، كَيْفَ يُحْشَرُ الْكَافِرُ عَلَى وَجْهِهِ ؟ قَالَ : أَلَيْسَ الَّذِي أَمْشَاهُ عَلَى الرِّجْلَيْنِ فِي الدُّنْيَا ، قَادِرًا عَلَى أَنْ يُمْشِيَهُ عَلَى وَجْهِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ قَالَ قَتَادَةُ : بَلَى وَعِزَّةِ رَبِّنَا(بُخاری شریف: ۶۵۲۳)
अनुवाद
हज़रत अनस बिन मालिक (रज़ि.) ने बयान किया कि एक साहब ने अर्ज़ किया या नबी अल्लाह! ये कुफ़्फ़ार (क़ियामत के दिन) अपने चेहरे के बल किस तरह जमा किए जाएंगे? (मुँह के बल किस तरह चलेंगे?) आंहुज़ूर (ﷺ) ने फ़रमाया क्या वह ज़ात जिसने दुनिया में दो पाँव पर चलाया क्या उस पर क़ादिर नहीं है कि क़ियामत के दिन उन्हें उनके चेहरे के बल चलाए? क़तादा ने कहा ज़रूर है, हमारे रब की इज़्ज़त की क़सम। (नस्रुल बारी)