एल.आई.सी में सूद (ब्याज़) भी है और क़िमार (जुआ) भी। अगर स्कीम लेने वाला मुद्दत (अवधि) पूरी होने तक ज़िंदा रहा, तो इज़ाफ़े (बढ़ोतरी) के साथ रक़म मिलती है, यह सूद है। और अगर उससे पहले ही उसका इंतिक़ाल (निधन) हो गया हो, तो ख़्वाह उसने कितना भी जमा किया हो, वह मुकम्मल (पूरी) रक़म हासिल करता है, यह क़िमार और जुआ है। इसलिए एल.आई.सी जायज़ नहीं, और इस जैसे गुनाह का इर्तिकाब (करना) जायज़ नहीं। इसी तरह गुनाह के काम में तआवुन (सहयोग) और लोगों को इस काम की तरफ़ दावत देना भी जायज़ नहीं। (किताब : किताब अल-फ़तावा / जिल्द: 5 / पृष्ठ: 362)