क़ुर्बानी का गोश्त बिना वज़न तक़्सीम करने का हुक्म।
बग़ैर वज़न के क़ुर्बानी के गोश्त को शूरका (साझेदारों) के दरमियान तक़्सीम करना जाइज़ नहीं। (और इसका गोश्त शूरका के दरमियान वज़न करके तक़्सीम किया जाए क्योंकि यह मौज़ून [वज़नी] है, न कि अंदाज़े से, क्योंकि तक़्सीम में तमलीक [मालिक बनाने] का मअना होता है, इसलिए अंदाज़े से जाइज़ नहीं [मुल्तक़ल अबहुर मअ मजमउल अनहुर, जि: 3, पृ: 517] और इसी तरह शामी में है)। (किताब: हबीबुल फ़तावा / जि: 4 / पृ: 257)