बिना शरई उज़्र (धार्मिक कारण) के जमात की नमाज़ को तर्क करना (छोड़ना) बहुत बड़ी महरूमी है, और इस्लाम के बड़े शआर (प्रतीक) को तर्क करना है। फ़ुक़हा-ए-किराम के नज़दीक इस जमात छोड़ने वाले की शहादत (गवाही) क़बूल नहीं की जाएगी और वह गुनहगार होगा। हदीस शरीफ़ में इस पर सख़्त वईदें (चेतावनियाँ) वारिद हुई हैं, नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: "उससे उसकी वह नमाज़ क़बूल नहीं की जाएगी जो उसने पढ़ी"। (अहम मसाइल / जिल्द: 1 / सफ़ा: 32)