"करते हो तमन्ना मौत की!!
क्या हिसाब-किताब आसान लगता है!!
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Ummah Post
8 June, 2025

"करते हो तमन्ना मौत की!!

क्या हिसाब-किताब आसान लगता है!!

जन्नत, जहन्नम, आख़िरत!!

क्या तुम्हें यह सब मज़ाक लगता है!!"

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युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ
लेख

युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ

कितने पुरुष हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अल-माएदा" की तफ़सीर पढ़ाई गई और कितनी महिलाएँ हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अन-नूर" की तफ़सीर पढ़ाई गई? जानता हूँ, बहुत कम हैं। मगर दूसरी तरफ देखें...! कितने पुरुष हैं जिन्होंने माता-पिता से बालिग होने के बाद सुना कि "तुम्हारी कोई ऐसी-वैसी बात न स...