"एक आस लगाए बैठा हूँ,
एक बार तो काबा देखूँ मैं।
इस शहर की दिलकश फ़िज़ाओं में,
एक बार तो जलवा देखूँ मैं।
प्यासा हूँ आब-ए-ज़मज़म का,
एक बार तो पी के देखूँ मैं।
फिर चाहे होश गँवा बैठूँ,
एक बार मदीना देखूँ मैं।"
"एक आस लगाए बैठा हूँ,
एक बार तो काबा देखूँ मैं।
इस शहर की दिलकश फ़िज़ाओं में,
एक बार तो जलवा देखूँ मैं।
प्यासा हूँ आब-ए-ज़मज़म का,
एक बार तो पी के देखूँ मैं।
फिर चाहे होश गँवा बैठूँ,
एक बार मदीना देखूँ मैं।"