एक इबरतनाक जुर्म की दास्तान और मां की ममता
हज़रत मालिक बिन दीनार (अल्लाह उन पर रहम करे) फ़रमाते हैं: "मैंने अपने जीवन में 60 हज किए। एक हज के मौक़े पर मैंने मक्का मुकर्रमा में असाधारण भीड़ देखी, जहाँ लाखों लोगों का एक अज़ीम...
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हज़रत मालिक बिन दीनार (अल्लाह उन पर रहम करे) फ़रमाते हैं: "मैंने अपने जीवन में 60 हज किए। एक हज के मौक़े पर मैंने मक्का मुकर्रमा में असाधारण भीड़ देखी, जहाँ लाखों लोगों का एक अज़ीम...
एक महिला कहती हैं: एक दिन मैं अपने घर की सफ़ाई कर रही थी, इतने में मेरा बेटा आया और शीशे का एक नायाब तोहफा (शाहकार) गिरा दिया और वह टूट गया। मैं उससे बहुत नाराज़ थी क्योंकि यह बहु...
मेरे भाई ने मुझे अपने एक दोस्त से सुना हुआ सच्चा वाक़या सुनाया, जो मैं अपनी बहनों के लिए बतौरी नसीहत (सीख के रूप में) पेश कर रहा हूँ। मेरे एक अज़ीज़ (रिश्तेदार) पैरिस में काफ़ी समय...
घर से बाहर निकलते ही आपका दो प्रकार की महिलाओं से सामना होता है। पहली प्रकार: उन महिलाओं की है जो अज़ीज़-ए-मिस्र की पत्नी जैसी बीमारी का शिकार हैं। खूब बन-संवर कर, परफ्यूम लगाए,...
हज़रत मौलाना पीर ज़ुल्फ़िकार अहमद नक़्शबंदी ने एक वाक़या सुनाया कि 1994 में जब समरक़ंद जाने का मौक़ा मिला, तो जामिया मस्जिद समरक़ंद में जुमा का ख़ुत्बा दिया। जुमा की नमाज़ के बाद क...
एक नौजवान लड़की एक सुपरमार्केट में अपने जिस्म की नुमाइश करते हुए फ़ित्ना अंगेज़ (उत्तेजक) अंदाज़ में जा रही थी। उसके अंदाज़ में ऐसी खुद-नुमाइश (दिखावा) और खुद-सताई (अहंकार) थी जैसे...
सल्फ़-ए-सालिहीन (नेक पूर्वजों), मुहाद्दिसीन (हदीस के विद्वानों) और फ़ुक़हा (शरिया कानून के विशेषज्ञों) पर इल्म (ज्ञान) में व्यस्त रहने का किस कदर ग़लबा (असर) था, इसका कुछ अंदाज़ा न...
माह-ए-रमज़ानुल मुबारक मुसलमानों के लिए महज़ एक इबादती महीना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा महीना है जो न सिर्फ़ व्यक्ति की रूहानी (आध्यात्मिक) तरबियत (प्रशिक्षण) करता है, बल्कि सामाजिक ज...
हज़रत दाऊद बिन रशीद (रह.) फ़रमाते हैं: मुल्क-ए-शाम (सीरिया) में दो हसीन-ओ-जमील इबादतगुज़ार नौजवान रहते थे। कसरत-ए-इबादत (अधिक इबादत) और तक़्वा व परहेज़गारी की वजह से उन्हें 'सबीह'...
हज़रत मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब नानौतवी (रहमतुल्लाही अलैहि) का मुज़फ़्फ़रनगर में एक थानेदार मुअतक़िद (भक्त/प्रशंसक) था। एक दिन उसने हज़रत मौलाना नानौतवी की दावत की। मौलाना ने देखा...
सालिहीन (नेक लोगों) में से एक शख़्स रोज़ाना शहर की दीवार पर खड़े होकर रात में यह आवाज़ लगाता था, "चलो, क़ाफ़िले के चलने का वक़्त आ गया है"। जब उनका इंतक़ाल (निधन) हो गया, तो शहर के...
सुलेमान बिन अब्दुल मलिक, जो बनू उमय्या का बादशाह था, ने एक मर्तबा शैख़-उल-हदीस अबू हाज़िम (रहमतुल्लाह अलैह) से दरयाफ़्त (पूछा) किया कि इसकी क्या वजह है कि हम लोग दुनिया को पसंद और आ...