पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)
शेख़-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब (दामत बरकातुहुम) अपनी मशहूर तस्नीफ़ "उलूम-उल-क़ुरआन" में लिखते हैं: "यह पांच तफ़सीरें (यानी तफ़सीर-ए-कबीर, तफ़सीर इब्न कसीर,...
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शेख़-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब (दामत बरकातुहुम) अपनी मशहूर तस्नीफ़ "उलूम-उल-क़ुरआन" में लिखते हैं: "यह पांच तफ़सीरें (यानी तफ़सीर-ए-कबीर, तफ़सीर इब्न कसीर,...
लीसेस्टर (ब्रिटेन) में उलेमा-ए-किराम (विद्वानों) की एक महफ़िल में एक बार हज़रत मौलाना शाह अबरारुल हक़ हरदोई साहब (रहमतुल्लाह अलैह) ने फ़रमाया: "मान लीजिए कि इंडिया के किसी गांव...
शुक्र अदा करने का एक फायदा तो यह होगा कि आपकी की हुई इबादत अल्लाह के हुज़ूर में क़बूल व मंज़ूर होगी क्योंकि अल्लाह को शुक्र बड़ा पसंद है। दूसरा फायदा यह होगा कि अल्लाह की तरफ से इब...
विद्वानों और गणमान्य लोगों (خواص) के वर्ग में कोमलता और मधुर स्वभाव होना अत्यंत आवश्यक है। सख्त लहजे में बात करना और किसी बात पर नाराज़ होना, अगर सुधार और तरबियत (परवरिश) की भावना...
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक बार सफ़र पर जा रहे थे, ग़ालिबन (शायद) हज या उमरे का सफ़र था। साहिबे-हैसियत (धनी) अरबों की आदत के मुताबिक़, आप सफ़र पर जाते हुए सवा...
मुही-उस-सुन्नत हज़रत शाह अबरार-उल-हक़ से कुछ लोगों ने शिकायत की कि मुसलमानों की परेशानियां दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं, खानक़ाहों और मदरसों में दुआओं का खूब प्रबंध हो रहा है, अल्...
सालिहीन (नेक लोगों) में से एक शख़्स रोज़ाना शहर की दीवार पर खड़े होकर रात में यह आवाज़ लगाता था, "चलो, क़ाफ़िले के चलने का वक़्त आ गया है"। जब उनका इंतक़ाल (निधन) हो गया, तो शहर के...
(१) अल्लाह तआला जब किसी को औलाद दे और वह सयानी (समझदार) होने लगे, तो सबसे पहले उसको कलमा-ए-तौहीद (एकेश्वरवाद का मूलमंत्र) सिखाए। फिर उसको ज़रूरी आदाब (शिष्टाचार) सिखाए। (२) जब साम...
रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाया करते थे: "मेरा दुनिया से क्या तअल्लुक़ (संबंध)? मेरी दुनिया की मिसाल तो ऐसी ही है कि जैसे कोई सवार किसी दरख़्त (पेड़) के साए में (दम लेने के लिए) ठहर जाए, फिर...
फ़तह-ए-मक्का (मक्का की विजय) के मौक़े पर जगह-जगह हुज़ूर रहमतुल लिल आलमीन ﷺ (सारे संसार के लिए दया होने) के जलवे नज़र आते हैं। बल्कि वास्तविकता यह है कि मक्का की विजय का सबसे बड़ा क...
❶ एक ज़ाहिद (वैरागी) का क़िस्सा मंकूल (वर्णित) है कि वह रोटी के बिना सिर्फ़ सब्ज़ी और नमक वगैरह खा लेते थे। किसी ने कहा, "बस आप इसी पर गुज़ारा करते हैं?" उन्होंने फ़रमाया, "मैं अपन...
तीसरी सदी हिजरी में मिस्र में चार मुहद्दिसीन (हदीस के विद्वान) बहुत मशहूर हुए। चारों का नाम 'मोहम्मद' था, और चारों ही इल्म-ए-हदीस के जलील-उल-क़द्र (महान) अइम्मा (इमामों) में शुमार...